गुरुवार, जुलाई 23, 2020

आज किसे भगवान चाहिए?

        एक बार नारद जी महा-शिवरात्रि के अवसर पर धरती पर अपना भेष बदल कर पहुँचे। उन्होंने चारो तरफ घूम-घूम कर देखा, असंख्य भक्त विभिन्न मंदिरों में शिव जी को जल  चढ़ाने के लिए लंबी-लंबी कतारों में लगे हुए थे। भांग, धतूरा, पुष्प, चंदन, दूध एवं शहद आदि सामग्रियों से युक्त सभी श्रद्धालुओं को अपने भगवान भोलेनाथ पर जल चढ़ाने के लिए उत्साह देंखते हीं बनता था।


         जहाँ तक नज़र डालो सब शिवमय प्रतीत हो रहा था। यह देख कर नारद जी अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्हें धरती पर भगवान शंकर जी के प्रति अगाध प्रेम और असीम श्रद्धा देख बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर उन्हें एक ऐसे गांव के विषय मे पता चला जहां प्रत्येक व्यक्ति हीं शिव  जी का अनन्य भक्त था।  वृद्ध, युवा,बालक आदि सभी के मुख से ओम नमः शिवाय का जाप सहज हीं सुनने को मिल जाता  था। एक परिवार तो ऐसा था जो बहुत समृद्ध तो था हीं साथ मे दान पुण्य करने में बहुत आगे रहता था। इस परिवार ने अनेक शिव मंदिरों  का निर्माण करवाया था। इस परिवार ने एक ऐसा कीर्तन भवन भी बनवाया था जहां रात दिन भगवान शंकर जी की विशाल मूर्ति के आगे घी के अनेक दिए जलाए जाते थे और चौबीसों घंटे अनेक कीर्तन मंडलियों  द्वारा शिव  कीर्तन किया जाता था।


          कीर्तन के अतिरिक्त इस परिवार द्वारा रात दिन अनवरत गरीब, दुःखी और वंचित लोगों के लिए समुचित भोजन की व्यवस्था भी की जाती थी। 


           नारद जी ने पूरा गांव भेष बदल कर घुमा और भक्ति रस में डूबे गांव को देख कर उन्हें लगा जैसे वो शिव लोक में हीं पहुंच गए हो। उनके हृदय में इच्छा हुई कि लौट कर वह शिव लोक जा कर भगवान शंकर जी से इस गांव और यहां के भक्तों के विषय मे बताएंगे और यदि भगवान शंकर मान जाएं तो उन्हें इस गाँव और यहां के लोगों को दिखाने के लिए यहां अवश्य ले कर आएंगे।


           लौटने के बाद नारद जी सीधे शिवलोक गए और भगवान शंकर जी से मुलाकात कर, उन्हें सभी बातों से अवगत कराया और साथ हीं उन्हें भी वहां चलने के लिए विशेष आग्रह किया।  



              भगवान शंकर जी ने कहा, "छोड़ो नारद जी, मैंने बड़े से बड़े भक्त और उनकी तपस्या देखी है। अब इस कलियुग में कहाँ भक्त और कहँ उनकी भक्ति?



             परंतु नारद जी अड़ गए और उस गाँव मे लोगों की और उस अमुक परिवार की भक्ति के प्रभाव का पुनः दावा करने लगे। नारद जी बोले, "प्रभु! उनकी भक्ति को एक बार जरूर देखें, मैंने हमेशा आपको अपने भक्तों की सुध लेते देखा है। अब भी आप उन भक्तों से मुख मत मोड़िये, मेरे कहने से एक बार कृपा करके  जरूर चलिए।



         नारद जी के विशेष और बार बार आग्रह करने पर शंकर जी जाने के लिए  तैयार हो गए।


       
        उस गाँव मे उसी रात एक गर्जना के साथ आकाशवाणी हुई कि भगवान शंकर जी और नारद जी वृद्ध व्यक्ति का रूप धारण कर के आएंगे और तीन माह तक इसी गांव में रुक सकते है। धर्म और मोक्ष का संयोग रहेगा, लेकिन जो भी इस राज को गांव के अतिरिक्त  किसी अन्य को बताएगा तो पूरा गांव विनाश को प्राप्त हो जाएगा।


          गांव वालों की खुशी का ठिकाना नही रहा। सबके घरों में घी के दिये जलाए गए। रास्तों पर इत्र का छिड़काव किया गया। वैदिक मंत्रोच्चारण और भजन कीर्तन की गूंज से समूचा गांव गुंजायमान था।


       शाम को समूचा गांव व्याकुल हो भगवान शंकर जी और नारद जी  के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी दूर से दो वृद्ध जन गांव की तरफ बढ़ते दिखाई दिए।


         पूरा गाँव 'ओम नमः शिवाय' के मंत्र से गूंज उठा। लोगों के भाव और दृश्य से लग रहा था कि यह दृश्य वाकई शिव लोक का हीं है।


          भले हीं भगवान शंकर जी और नारद जी ने वृद्ध रूप धर अपना वेश बदला हुआ था फिर भी सब ने भगवान शंकर को उनके  तेज, मुस्कुराहट, नेत्र आदि से पहचान लिया और बात बात पर नारायण-नारायण की उक्ति बोलने के कारण नारद जी की पहचान भी सरल थी।



            सभी लोग भगवान शंकर जी और नारद जी को अपने अपने घर रोकने का आग्रह करने लगे, लेकिन अंततः यह निर्णय लिया गया कि शंकर जी और नारद जी किसी के घर रुकने की बजाय गांव के हीं द्वार पर बनाये गए भव्य अतिथि गृह में अगले तीन माह तक ठहरेंगे  अतिथि गृह को पूर्णता और पवित्रता से सजाया गया। शास्त्रों में वर्णित हर वो सामग्री जो भगवान शंकर जी को प्रिय थी वहां उपलब्ध कराई गई। पूरा गांव एक दैवीय सुगंध में खो रहा था। सबको लग रहा था कि उनके सभी बिगड़े और अधूरे काम अब बन जाएंगे।



           सभी परिवारों को  एक एक दिन  भगवान शंजर जी और नारद जी  की सेवा का अवसर प्रदान किया गया।



            रात हुई तो नारद जी भगवान शंकर से बोले, "देखा प्रभु! मैं कहता था न कितना प्रेम, भक्ति और समर्पण है इनके हृदय में!  शंकर जी मुस्कुरा दिए किन्तु कुछ बोले नहीं।



     समूचा गांव भगवान शंकर जी की भक्ति और सेवा में डूब गया। आज सबसे पहले परिवार की बारी थी।परिवार ने तरह तरह के पकवान और अन्य विभिन्न प्रकार के व्यंजन, फल इत्यादि प्रभु भोलेनाथ (शंकर जी) को समर्पित किया। परिवार ने खूब जम कर भगवान शंकर और नारद जी की सेवा की और आशीर्वाद ले कर रात को अपने घर लौट आया।



      रात को आते हीं उनके बेटे की तबियत काफी खराब हो गई, पत्नी सीढ़ी से गिर गई  जिससे उसे काफी चोट लग गई थी। उनकी सारी खुशी ग़म में परिवर्तित हो गई।



    अगले दिन भी जिस परिवार की बारी थी  उसने भी अपने पूरे परिवार के साथ भगवाब की खूब सेवा की लेकिन  घर लौटने के बाद उनके घर मे भी एक दुखद घटना घट गई थी। उनकी माता जी का देहांत हो गया। पूरे परिवार में मातम का माहौल छा गया।



     प्रतिदिन इसी तरह चलता रहा। जो भी परिवार जाता था, भगवान की सेवा करता था, उनके जीवन मे कोई न कोई सांसारिक परेशानी आ जाती थी।



      धीरे धीरे अब गांव के लोगों के उत्साह, समर्पण और भक्ति भावना में कमी आने लगी। लोग अब पहले की तरह जमघट लगाकर जैसे अतिथिगृह के सामने बैठे रहते थे, उनकी संख्या भी निरंतर घटने लगी थी।



     दो दिन बाद पुनः शिव रात्रि का त्योहार आने वाला था। उस गांव के सबसे धनी, समर्पित और प्रभुत्वशाली परिवार ने अपने परिवार की बारी आरम्भ में हीं शिव रात्रि के दिन रखवा दी थी ताकि प्रभु शंकर जी और नारद जी  की विशेष कृपा इस विशेष दिन उसे और उसके परिवार को प्राप्त हो सके।



     महा-शिव रात्रि का अमुक दिवस भी आ गया। समूची धरती पर मंदिर और शिवालयों पर जिधर भी नज़र दौड़ाइए लंबी-लंबी कतारें भगवान को जल  चढ़ाने के लिए व्याकुल प्रतीत होती थी।



      लेकिन किसी को कहां मालूम था आज भगवान शंकर जी, नारद जी के साथ साक्षात इस धरा पर उस  सौभाग्य से परिपूर्ण गांव में स्वयं मौजूद थे। अहा! क्या किस्मत थी इस गांव की।



       पर यह क्या? आज भगवान शंकर जी और नारद जी के पास जिस तथाकथित  सबसे धर्मार्थी और समर्पित परिवार को आना था, वह नहीं आया। गांव में हीं उपस्थित शंकर जी के मंदिर में हीं लोग पहले की तरह पंक्ति लगाकर जल चढ़ाने  के लिए एकत्रित होने लगे। आज फिर वह धनी और प्रभुत्व शाली परिवार दान दक्षिणा देने और भगवान शंकर जी की मूर्ति पर सैकड़ो बाल्टी दूध चढ़ा कर सबसे धार्मिक परिवार का खिताब अपने नाम कर गया।



      क्या महा-शिवरात्रि थी! सब जगह भगवान भोलेनाथ(शंकर जी) शंकर जी की मूर्ति पर फल, दूध, भांग, धतूरा इत्यादि को असीमित मात्रा में चढ़ाया गया था। चारो ओर मंदिर के गूंजते  घंटों के साथ 'ओम नमः शिवाय' का उदघोष हो रहा था परंतु जहां स्वयं भोलेनाथ साक्षात मौजूद थे, उस अतिथि गृह में  उनकी सुध लेने वाला कोई नही पहुंचा।भगवान शंकर जी और नारद जी अभी तक भूखे प्यासे किसी श्रद्धालु या भक्त की प्रतीक्षा में बैठे थे। 



      रात हो गई। कोई नहीं आया। नारद जी बोले, "प्रभु! मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है। मुझे पता है जो भी परिवार आया,  उसके किसी भीषण कष्ट को आपने छोटे कष्ट में परिवर्तित कर दिया। जिसका जीवन भीषण दुःख भोग रहा था उसे मुक्ति दे आपने मोक्ष प्रदान कर दिया, फिर भी ये लोग ऐसे निकले! मुझे बहुत ग्लानि हो रही है, प्रभु! मेरे आग्रह पर हीं आप यहाँ आए। आपके हृदय को जो ठेस पहुंची है उसका जिम्मेदार मैं हूँ।"



     भगवान शंकर जी बोले, "नारद जी! ये कलियुग है, यहाँ सब कुछ स्वार्थ से वशीभूत हो कर किया जाता है। यहां धर्म हृदय से निकल कर सिर्फ ज़ुबान तक रह गया है। इनके स्वार्थ के कारण हीं धर्म इनके जीवन से लुप्त हो चुका है। देवताओं ने भी इसी कारण से धरती का त्याग कर दिया है। चारों ओर  एक अनिश्चितता, एक बेचैनी, एक कालिमा निरंतर फैलती जा रही है। इंसान देख कर और समझ कर भी अपनी आत्मा की आवाज़ को अनसुना करने का साहष ढूंढ लेता है। आज इंसान धन के ख़ातिर हंसते हंसते अपना धर्म बेंच देता है। आज इंसान के कुकर्मों के कारण धरती त्राहिमाम कर रही है। बुजुर्ग अपने घरों में अपना स्थान खो वृद्धाश्रमों में रहने को अभिशप्त है। इन लोगों को  भगवान भी  पत्थर में हीं चाहिए जीवन मे नही। अगर इनके जीवन मे  साक्षात भगवान आ जाएंगे तो भी ये लोग उनसे आँखे चुरा कर उन्हें भी गुमराह करने की कलुषिता रखने में सक्षम है। इनका कुछ नहीं हो सकता, इनका सफर शून्य से प्रारंभ होकर शून्य में हीं विलुप्त हो जाता है।"



       नारद जी बोले, "हे देवों के देव महादेव! धन्य है आप। आप सचमुच भोले नाथ है जो इतना जानने के बाद भी मेरे आग्रह को मना नहीं कर पाए और अपने भान की परवाह किये बगैर इतना कष्ट झेला। क्षमा करें प्रभु!"


       शंकर जी मुस्कुराए और रात के अँधेरे में दोनों अंतर्ध्यान हो गए।



        सुबह जब लोगों को पता चला तो फिर वहाँ पूरा गांव इकट्ठा हो गया। सब बातें करने लगे, " वो दोनों कोई खतरनाक चोर हीं नहीं कोई मायावी शक्ति भी थे। भगवान का लाख लाख शुक्र है जो उन्होंने हमें बचा लिया। भगवान ने तो हमे पहले दिन से हीं संकेत दे दिया था, जब पहला परिवार सेवा कर के गया और उसके बेटे की तबियत खराब हो गई, पत्नी सीढ़ियों से गिर गई। हमे तभी समझ जाना चाहिए था।
हमे तो उसी दिन उन्हें गांव से भगा देना चाहिए था और जो आकाशवाणी हुई वो भी उन दोनों चोरों की कोई मायावी चाल रही होगी।"


     ये है कलयुग और कलयुग के इंसान.....


        कई बार भगवान एक दोस्त, एक संत, एक महापुरुष या किसी अन्य परिवर्तित  मानवीय या किसी अन्य भेष में हमारे सामने आते है परंतु हम इतने तुच्छ और स्वार्थी मानसिकता के शिकार हो गये है कि न हम उन्हें पहचान पाते है और न हीं उन्हें समझ पाते है। फिर भला आप उनकी पत्थर की प्रतिमा पर हज़ार तपस्याएं या खुशामदें करें, कुछ होने वाला नही है....ये सब विधियां स्वयं को भ्रम में लिप्त रख सिर्फ जीवन व्यतीत करने के साधन मात्र है। धर्म से युक्त दृष्टि, मस्तिष्क, त्याग और जीवन कभी आने भगवान को पहचानने से चुकता नहीं है......

    "अध्यात्म की डगर - एक जीवन यात्रा".....

पहचानिए, जानिए और मानिए


एक विशेष सूचना:--हमारी कहानी की प्रतीक्षा करने वाले,  पढ़ने वाले नियमित पाठकों के लिए एक विशेष सूचना है कि किन्ही कारणों से अब 20 अगस्त 2020  तक  हमारे ब्लॉग पर कोई नई कहानी या लेख प्रकाशित नही की जाएगी। उसके पश्चात पुनः प्रकाशन जारी रहेगा। तब तक आप अभी तक प्रकाशित अनमोल लेखों और कहानियों को पढ़ते रहिये और जीवन के हर रंग से रूबरू हो अपने आप को तलाशते रहिये। स्वयं से मिलने का प्रयास कीजिये......इसी कामना के साथ, आपका जीवन मंगलमय हो।

शुक्रवार, जुलाई 17, 2020

यूँ चले गए श्रीकृष्ण भी......

             जब जीवन अपने कर्तव्य पथ पर गतिमान होता है तब उसकी रवानगी और चमक का तेज सूर्य के समान होता है। यही कारण है कि जब  ईश्वर भी इस धरा पर अवतरित हुए तब अपने दैवीय स्वरूप को पूर्णतः विस्मृत कर, स्वयं को मानव रूप में स्वीकार कर अपने पुरुषार्थ को अपने मानवीय गुणों की शक्ति से मांजा, चमकाया और सिद्ध किया है।

           जब ईश्वर ने भी धरा(धरती) पर अपने आने का प्रयोजन सिद्ध कर लिया, उसके पश्चात इस मृत्युलोक को समुचित सम्मान देते हुए अपने लोक गमन के लिए उन्होंने भी किसी चमत्कारिक या दैवीय माध्यम को नहीं बल्कि मृत्यु को हीं वरण किया।


         तो चलिए, आज हम इस ब्लॉग (अध्यात्म की डगर - एक जीवन यात्रा) पर भगवान श्रीकृष्ण की  महाभारत के युद्ध के बाद की मनोस्थिति  तथा उनके परलोक (गौ लोक) गमन का किस्सा जानते है।


          महाभारत का युद्ध समाप्त  हो चुका था। पांडव विजयी घोषित हो चुके थे। कुरुक्षेत्र का मैदान कौरवों के खून से लहूलुहान था। लेकिन सबकी खुशी उस समय घोर निराशा में बदल गयी जब कौरवों की माता गान्धारी ने रणक्षेत्र में अपने पुत्रों की क्षत विक्षत लाशों को देख श्रीकृष्ण को उनके समूचे वंश समेत नष्ट  होने का अभिशाप दे डाला।


       हालांकि श्रीकृष्ण स्वयं ईश्वर थे, ईश्वरत्व के वाहक थे, धर्म के ध्वज थे। सबने सोचा एक गान्धारी का श्राप भगवान का भला क्या बिगाड़ पाएगा? फिर सब भूली बिसरी बात हो गयी। जीवन सामान्य गति से चलने लगा।


        उसके पश्चात श्रीकृष्ण द्वारका नगरी के नरेश बन गए। लक्ष्मी स्वरूपा रुक्मणि जी से उनका विवाह संपन्न हुआ। सभी प्रकार के ऐश्वर्य और सुख उनके राज महल में दासियाँ थी।


       श्रीकृष्ण के राज में यदुवंशी(श्रीकृष्ण जी के वंश का नाम)  बिल्कुल सुरक्षित और निश्चित जीवन व्यतीत कर रहे थे। समृद्धि और खुशहाली में उनका कोई सानी नही था। किसी भी पड़ोसी राजा की श्रीकृष्ण जी के चलते द्वारका की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत तो छोड़िए किसी की ऐसी सोच तक नहीं होती थी।


       अब महाभारत युद्ध को समाप्त हुए लगभग छत्तीस वर्ष हो चुके थे। एक दिन श्रीकृष्ण रानी रुक्मणि जी के साथ महल के अपने कक्ष में बहुत प्रसन्नता की मुद्रा में बैठे थे। अचानक हीं उन्हें गान्धारी का दिया हुआ श्राप याद आ गया। उनके चेहरे पर प्रसन्नता की जगह बेचैनी का भाव स्पष्ट  दिखने लगा।


       उनकी बेचैनी देखकर रुक्मणि जी ने पूछा, "स्वामी! आप तो हमेशा प्रसन्नता से भरे रहते है, आपका मुस्कुराता चेहरा देखने के लिए हीं धरती पर सुबह होती है। प्रकृति आपको देखकर हीं सजती और  संवरती  है। सभी कलाएं आपके द्वारा हीं संचालित होती है। आपकी इच्छा के विरुद्ध धरती पर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। आप सर्वव्यापी और सर्व सामर्थ्यवान है, फिर आज आपकी इस अतिशय बेचैनी का क्या कारण है?" श्रीकृष्ण ने कहा, "देवी! अब व्यर्थ में जीवन जीते बहुत दिन हो गए। अब जीवन जीने का कोई विशेष उद्देश्य भी नहीं है। सिर्फ अब एक माँ (गान्धारी) जिसने व्याकुल व तड़पते हृदय से श्राप दिया था, बस अब उनके श्राप  का भंजन(श्राप का शिकार)  होने का कार्य शेष है। अब धरती पर मन नहीं लगता, अब उनका श्राप मुझे सामने खड़ा दिखाई दे रहा है।" यह सुन रुक्मणि जी को बहुत आश्चर्य हुआ। वह बोली, "स्वामी! कोई श्राप या अभिशाप आपका भला क्या बिगाड़ सकती है?  आप तो स्वयं भाग्य निर्माता है, सृष्टि के पालनहार है।" श्रीकृष्ण जी बोले, "देवी! तुम्हे ज्ञात नहीं है, गान्धारी मेरी परम भक्त थी। वो अपनी पूजा में सिर्फ मेरा आह्वान करती थी, उसे पूरा विश्वास था कि उसके केशव (श्रीकृष्ण) के रहते उसके बच्चों का कोई बाल बांका भी नहीं कर पाएगा। हालांकि मैंने दुर्योधन आदि समेत कौरवों को कई बार युद्ध टालने के संकेत और अवसर प्रदान किये पर उन सबके मस्तिष्क पर पाप हावी था। पाप से युक्त बुद्धि न विनाश देखती है और न हीं ईश्वर को पहचानती है। मैं धर्म मे बंधे होने के कारण उन्हें बचा नहीं पाया। अतः मैं एक भक्त और  वेदना व शोक से व्याकुल माँ का दोषी हूँ।"


अगली प्रातः हुई। समय ने करवट ली। धीरे धीरे यदुवंशियों (श्रीकृष्ण जी का वंश) में विलासिता और विद्वेष बढ़ने लगा। वे आपस मे टकराने लगे। आचरण हीनता और धर्म हानि उनके जीवन शैली में शामिल हो, उन्हें कुकृत्य के मार्ग पर खींचने लगी।


     उन दिनों श्रीकृष्ण के पुत्र सांबा, जिसका जन्म  भगवान शंकर जी के वरदान स्वरूप  हुआ था, और उसे भगवान शिव के रुद्र अवतारों में से एक माना जाता है, जो दिखने में लगभग श्रीकृष्ण जी की तरह हीं सौंदर्य और आकर्षण से परिपूर्ण था, की शरारते, अभद्रता और आचरण हीनता बहुत बढ़ने लगी थी।


        एक दिन ऋषि दुर्वासा, विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि ऋषि श्रीकृष्ण से मिलने का मंतव्य लेकर द्वारका पहुँचे। रास्ते मे सांबा और उसके साथियों ने उन्हें देख लिया। उनके मन मे शरारत सूझी और सांबा ने एक गर्भवती स्त्री का छदम रूप धर, ऋषि गण से पूछा कि उसके गर्भ में लड़का है अथवा लड़की?


       ऋषि गण ने अपनी सिद्ध विद्या से जान लिया कि वो सब उनका मजाक उड़ा रहे है। दुर्वासा ऋषि तो अपने क्रोध और श्राप देने के लिए तीनो लोकों में प्रसिद्ध थे। उन्होंने क्रोधवश सांबा को श्राप दे दिया कि " जाओ तुम्हारे गर्भ से लोहे का छड़ पैदा होगा और वही तुम्हारे व तुम्हारे वंश के विनाश का कारण भी बनेगा।"


        अगली सुबह सांबा के गर्भ से लोहे का छड़ उत्पन्न हुआ जिसे द्वारका की सीमा से लगे समुंद्र में फैंक दिया गया जो बाद में समुंद्र तट पर पतले पतले छड़ के रूप में घास के समान उग गए।


      कालांतर में जब यदुवंशियों में युद्ध छिड़ा तो उन लोगों ने उसी समुंद्र से उन छड़ो को निकाल हथियार के रूप में प्रयोग किया और एक दूसरे का विनाश कर डाला।


     उन्ही छड़ों में से एक छड़ एक ज़रा नामक शिकारी ले गया। उसे एक दिन जंगल मे शिकार करते समय झाड़ियों की आड़ से कुछ बहुत हीं चमकती चीज़ दिखाई दी, हिरण समझ उसने बाण चला दिया।



     ये हिरण नहीं, श्रीकृष्ण के पैरों में चमकते दिव्य पदम थे। कष्ट और पीड़ा के बीच श्रीकृष्ण ने शांति और मुस्कुराहट के साथ शरीर त्याग दिया। मृत्युलोक छोड़ अपने लोक को गमन कर गए। दुनिया को छलने वाले छलिये ने अपने जाने के लिए मृत्यु को भी छल दिया, वरना मृत्यु की भी कहाँ मज़ाल थी कि उनकी तरफ आँख उठाकर देख पाती।


         श्रीकृष्ण भगवान थे, तीनो लोकों के अधिपति थे, वह सब कुछ टाल सकते थे, लेकिन भगवान होकर भी उन्होंने मानवीय सौंदर्य की गरिमा रख, गान्धारी के शब्दों को पूर्ण करने के लिए अपने समेत अपने समुंचे कुल को झौंक दिया।


     आज जब  छोटे छोटे स्वार्थों के वशीभूत होकर मनुष्य अपने मानवीय धर्म से विमुख होकर, अंधकार में अपने आप को नही देख रहा है कि वो क्या कर रहा है? कहाँ जा रहा है?
अपने माँ-बाप,बीवी, बच्चों, बंधु बांधवों और परिवार को चलाने के लिए, उनके मोह में वशीभूत होकर भगवान को भी भूल गया है।



        जरा सोचिए। जिस श्रीकृष्ण ने भगवान होकर भी अपना धर्म बचाने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, वो फिर तुम्हे, तुम्हारे तुच्छ और स्वपरिभाषित जीवन दशा के लिए क्या सज़ा निर्धारित कर सकता है...?

         अध्यात्म की डगर - एक जीवन यात्रा


जीवन से पहले, जीवन के साथ और जीवन के बाद......



पहचानिए, जानिए और मानिए

सोमवार, जुलाई 13, 2020

सोंच हीं जीवन उद्धार का मार्ग है

          बहुत समय पहले एक खूंखार डाकू रहता था जिसका नाम सुल्तान सिंह था। जहां लूटमार और हत्या करना उसके लिए आम बात थी, वहीं उसकी  एक बहुत विचित्र आदत थी कि वह दिनभर अपना भेष बदल कर दूर- दूर तक बीहड़ देहात में घूम घूम कर देखता था कि कहीं कोई जरूरतमंद तो  नहीं है, और यदि कोई गरीब  किसी मुसीबत में होता था तो उसकी हर संभव मदद करता था।


      वह कभी भी किसी गरीब और असहाय को नहीं सताता था। उसके निशाने पर हमेशा धनाढ्य या ऐसे लोग रहते थे जो गरीबों का हक मारकर अपनी तिज़ोरी भरते थे। अपनी इस आदत के चलते वह गरीबों का मसीहा भी  कहा जाता था।


        एक दिन अपनी नियमित आदत के अनुसार वह किसी देहात (countryside) में अपना भेष बदल कर भ्रमण कर रहा था। भीषण गर्मी का दिन था उसे बहुत तेज प्यास लगी हुई थी।  आज वह अपना मार्ग भटक गया था तथा भटकते-भटकते वह बहुत निर्जन बीहड़ में जा पहुंचा था। दूर दूर तक कहीं किसी आबादी का कोई नामो निशान तक नहीं था।
प्यास के मारे वह बहुत व्याकुल हो गया था।


      अब उसके लिए एक कदम भी चलना दूभर था। थोड़ी दूर और चलने के बाद वह बेहोश होकर गिर पड़ा। 


         काफी समय बाद जब उसे होश आया तो उसने खुद को एक बहुत बड़े आश्रम के एक  कुटिया में पाया।
खुद को वहाँ देख कर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगा कि वह वहां कैसे पहुंचा? कोई उसे पहचान तो नही लेगा? इन्ही सब बातों में वह डूबा हुआ था कि उसके कानों में कुछ आवाज आई,  ऐसा लगा कि आस पास हीं कोई धार्मिक चर्चा चल रही थी।
वह कुटिया से बाहर निकला तो देखता है कि एक लंबी चौडी कद काठी के, सफेद दादी व बालों से युक्त, चौड़ी ललाट और अत्यंत तेज से युक्त छवि का कोई व्यक्ति आश्रम में स्थित विशाल  बरगद के पेड़ के नीचे ध्यान मग्न बैठे थे। उनके मुखमंडल से अत्यंत तेज व अपूर्व शांति की अनुभूति हो रही थी। 


         आसपास बैठे अनेको शिष्य किसी  विशेष विषय  को लेकर अपने अपने मतों के साथ शास्त्रार्थ कर रहे थे। उनके तर्क  का  विषय था कि धर्म क्या है?  ऐसे हीं धर्म से अन्तर्सम्बन्धित प्रश्नों की एक श्रृंखला थी जिसे लेकर वे सब परस्पर चर्चा कर रहे थे। सब आपस मे वाद विवाद तो कर रहे थे लेकिन एक सर्वमान्य निष्कर्ष अथवा तथ्य  पर कोई नही पहुंच पा रहा था। सब गुरु जी के ध्यान से उठने और इस विषय पर उनके मुख से क्या व्याख्यान आता है, इसकी प्रतीक्षा कर रहे थे।


        संध्या का समय हो चला था परंतु अभी तक गुरु जी अपनी पूर्ववत अवस्था अथवा ध्यानमग्न हीं बैठे थे।


       आधी रात हो गई, अब गुरु जी ने आँखे खोली, आसन से उठ, नित्य क्रिया करने के पश्चात, आश्रम से हीं लगकर बहती गंगा  नदी के घाट पर स्नान-ध्यान, पूजा पाठ आदि किया, तत्पश्चात फल इत्यादि ग्रहण करके निश्चित हो गए। 


      फिर सभी शिष्य एकत्रित हुए और अपनी पिछली रात की चर्चा को गुरु जी के समक्ष रखा।


      अभी तक सभी कुछ देख कर डाकू सुल्तान सिंह को एक अलग सुखद संसार की अनुभूति हो रही थी। उसके लिए सब कुछ नया था। गुरु जी के शब्दों में, उनकी छवि में, एक अभूतपूर्व आकर्षण शक्ति थी जिसने सुल्तान सिंह को वहाँ रुकने को विवश कर रही थी।


   वह चुपचाप गुरु जी के समीप आया और बैठ गया।

      गुरु जी ने कहा, "आज मैं तुम सबको तुम्हारे नए साथी डाकू सुल्तान सिंह से मिलवाता हूँ।"


       सब चौक पड़े। सबकी नजरें उस तरफ कौंध गई, जिस तरफ सुल्तान सिंह बैठा था।


         सुल्तान सिंह की हैरानी की तो मत पूछिए। एक तो उसने अपनी वेश-भूषा बदल रखी थी और दूसरा ये कि गुरु जी से उसका अभी तक सामना हीं नहीं हुआ था, फिर भी उसके विषय मे उन्होंने कैसे जान लिया? 


     गुरु जी ने सुल्तान सिंह पर अब अपनी दृष्टि डाली और मुस्कुराए। उस क्षण मानो सुल्तान सिंह की दुनिया हीं बदल गई।  गुरु जी की उस दिव्य और मनमोहक मुस्कान तथा आंखों में एक अभूतपूर्व विश्वास ने मानो सुल्तान सिंह से कहा हो, अब ठहर जा।"


     गुरु जी ने कहा, "अब सभी लोग जाओ। लगभग पांच घंटे तक ध्यान लगाना और फिर मेरे पास आना, सबको उसका जवाब मिल जाएगा।"


        सब लोग चले गए। सुल्तान सिंह को सबकुछ एक सुंदर स्वप्न जैसा लग रहा था। उसके ज़हन में दूर दूर तक इस बात का अहसास तक नहीं था कि वह कभी डाकू भी था।


      सुल्तान सिंह ने बड़े हीं विनम्र होकर गुरु जी से पूछा, "गुरुदेव, ध्यान कैसे लगाते है? 
गुरु जी ने कहा, "बस आंख बंद कर जो भी ईश्वर तुम्हे सबसे प्रिय हो उनपर अपना ध्यान केंद्रित करना।"
फिर सुल्तान सिंह उस उपवन रूपी आश्रम में एक वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाने बैठ गया।


       पाँच घंटे बाद सभी पुनः एकत्रित हुए।  गुरु जी ने पूछा, "सब बताओ कि सबको ध्यान में क्या अनुभूति हुई?'
सब बोले, "हमे तो सिर्फ डाकू सुल्तान सिंह हीं दिखाई दे रहा था। उसके विषय मे हमने बहुत कुख्यात कहानियां सुन रखी है, हमे प्रतीत हो रहा था कि आपके आदेशानुसार और इच्छानुसार यदि सुल्तान सिंह यहां रहने लगेगा तो हम सबका जीवन संकट में पड़ जाएगा। यही सोचते सोचते कब पाँच घंटे बीत गए, पता हीं नहीं चला।


         फिर गुरु जी ने पूछा, "सुल्तान सिंह! तुम बताओ? सुल्तान सिंह बोला, " गुरु जी, मुझे तो पांच घंटे की समूची अविधि में सिर्फ आप हीं नज़र आते रहे, यह कह कर दौड़ते हुए सुल्तान सिंह गुरु जी के चरणों मे गिर पड़ा, और बोला गुरु जी, "मैं दुनिया का सबसे पापी आदमी हूँ, मैंने अनेको पाप किये है, मैंने जीवन के सिर्फ उसी रूप को जाना और पहचाना था। मैं भगवान या ईश्वर की सत्ता को नही मानता था।  जब मैंने आपको देखा तो आप मुझे सूर्य देवता की तरह प्रकाशमान प्रतीत  हुए। आपके दर्शन मात्र से मेरे मन मे जन्मों का व्याप्त अंधेरा दूर हो गया। मैं एकदम हल्का हो गया। गुरु जी!  मुझे अपने से कभी अलग मत करना।


      गुरु जी गंभीर हो चुके थे। बोले, 'यही धर्म है। तुम लोग वर्षों से यहां प्रकृति के सुंदर वातावरण और सुरक्षा के बीच  धर्म और ज्ञान की शिक्षा प्राप्त कर रहे हो, लेकिन जैसे ही तुम लोगों के जीवन को खतरा महसूस हुआ, तुम अपने ध्यान में चित नही लगा पाए। तुम्हारे डर ने तुम्हे भीतर से असंतुलित कर दिया।
ठीक इसी तरह जब जीवन मे सब कुछ सामान्य चलता है तो सभी धार्मिक और पुण्यात्मा का भ्रम पाले जीवन व्यतीत करते है परंतु जब जीवन वास्तव में परीक्षा लेती है तो सब अपने पथ से भ्रमित होकर भगवान की सार्वभौमिक और सर्वव्याप्त सत्ता को भी नकार देते है। 


          धर्म सोंच से आरंभ होकर कर्म में प्रतिबिम्बित होकर, जीवन मे साकार होकर, निराकार प्रभु द्वारा निर्मित व साकार सच्चे गुरु के सानिध्य में ईश्वरत्व व मोक्ष को प्राप्त होता है।
जीवन मे कितने भी धर्म कमाने वाला यदि एक पल के लिए भी अपने पथ से भ्रमित होता है तो उसका समूचा पुण्य नष्ट हो जाता है और वह नरकगामी होता है। अतः सोच पर लगाम ही ईश्वर के घर का रास्ता है।

      
          जबकि एक भ्रमित, पापी और दुष्ट प्रकृति का व्यक्ति भी यदि सच्चे मन से ईश्वर में लीन हो गया और सच्चे पश्चाताप की रस्सी से अपने सोच की लगाम को कस कर पकड़ लेता है तो वह ईश्वर के समीप हो जाता है।


     आपकी सोच में वह शक्ति है कि वह आपसे ऐसा कर्म करवा लें कि आपके जन्मों जन्मों के प्रारब्ध और पुण्य जल कर खाक हो जाए।


        जैसे लंका पति रावण जो ब्रह्मांड विजेता, वेदज्ञाता, पथ प्रदर्शक,महान तपस्वी और अद्वितीय वीर हो कर भी सिर्फ अपनी खंडित सोच के कारण प्रभु श्रीराम के स्वरूप को नही पहचान पाया और नाश को प्राप्त हो गया। जबकि उसी का भाई विभीषण अपने सोच से भक्ति की सीढ़ी चढ़ श्रीराम का प्रिय बन, अंततः मोक्ष को प्राप्त हुआ।


           सुल्तान सिंह की दृष्टि ने उसकी सोच में जाकर जो हलचल की, जिससे कि उसके जीवन मे प्रकाश का उदय हो उठा। वह खुशबू से इतना महक गया कि पाँच घंटे के ध्यान में वह पूर्णतः आनंद से विभोर रहा। यही आनंद धर्म की पहली सीढ़ी होती है।


          सब लोग गुरु जी के चरणों मे गिर पड़े। सबने सुल्तान सिंह को गले से लगा लिया। अब वह भक्त सुल्तान सिंह बन चुका था। गुरु जी ने सबको स्नेहयुक्त आशीष दिया और पुनः उसी विशाल बरगद वृक्ष के नीचे ध्यान लगाने चल पड़े।



     धर्म और ईश्वर के समीप जाने के लिए हज़ार वर्ष की आयु और अवसर की प्रतीक्षा आवश्यक नही बल्कि ईश्वर प्रेम की सोच से बनी एक  ऐसी मजबूत रस्सी चाहिए जिसे जीवन मे कोई भी झंझावात डिगा न पाए।


    "अध्यात्म की डगर - एक जीवन यात्रा"  


 जीवन से पहले भी, जीवन के साथ भी, जीवन के बाद भी


पहचानिए, जानिए और मानिए

गुरुवार, जुलाई 09, 2020

तोड़ डाली श्रीकृष्ण ने अपनी प्रिय "बाँसुरी"

                   प्रेम जीवन की सबसे अनमोल और खूबसूरत अभिव्यक्ति है। प्रेम हीं वह शक्ति है जो  जीवन को सार्थकता और ऊँचाई प्रदान करता है। प्रेम के विभिन्न रूप है, और अपने  हर रूप में प्रेम अपने मर्यादा, कर्तव्य-परायणता, समर्पण और त्याग के कारण अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप को प्राप्त करने  हेतु लक्षित होता है।


     
               प्रेम के अभाव में जीवन रस विहीन हो कर, निरर्थक और बोझिल प्रतीत होने लगता है।



                  तो चलिए,आज  इस  "अध्यात्म की डगर - एक जीवन यात्रा"  (ब्लॉग) से राधा जी और श्रीकृष्ण भगवान के पावन प्रेम की अलौकिक खुशबू को महसूस कर "राधा-कृष्ण" जो भारतीय जनमानस मे एक आध्यात्मिक  दिव्य मंत्र, वंदना और वरदान के रूप में सर्वव्याप्त है, को अपना श्रद्धा सुमन अर्पित कर श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम के इस अलौकिक  किस्से को जानते है।


         वृंदावन में श्रीकृष्ण अपने पालक माता पिता (यशोदा-नंद बाबा) के साथ रहते थे। उनकी बाल्यकाल की शारातों और अठखेलियों के साथ समूचा  वृंदावन झूम रहा था। धरती मुस्कुरा रही थी। समूची प्रकृति उन्हें निहार कर अपने सौभाग्य पर फूला नहीं समाती थी।
श्रीकृष्ण की बांसुरी की मधुर तान सुनने के लिए यमुना का तट और कदम्ब के पेड़ की वह डाली जिस पर श्री कृष्ण  बैठ कर घंटो बाँसुरी बजाया करते थे, उनकी नित्य प्रतीक्षा किया करते थे। गोपियाँ, ग्वाले, पशु, पक्षी और समूचा वृंदावन उनकी बाँसुरी की धुन में अपनी सुध बुध भुला उनको निहारता रहता था। समय भी अपनी गति को भूल मानो ठहर सा जाता था।


           परंतु श्रीकृष्ण की बांसुरी की तान जिसे तलाशती थी, वह राधा जी थी।
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          राधा जी भी बगल के गांव में रहती थी। वह अपने कान्हा (श्रीकृष्ण) के प्रेम में पूर्णतः समर्पित थी। श्रीकृष्ण की बांसुरी की तान पर वो अपने सारे काम काज को छोड़ दौड़ी चली आती थी। यमुना का पावन पनघट इनके दिव्य, मर्यादित और पवित्र प्रेम का सदा साक्षी रहेगा।


          तीनो लोक श्रीकृष्ण के प्रेम में डूबे हुए थे, लेकिन श्रीकृष्ण के हृदय में जिसके प्रेम की लौ जलती थी, वह राधा जी थी। 


          लेकिन श्रीकृष्ण कुछ और उद्देश्य लेकर धरती पर अवतरित हुए थे। 


          वह समय आ गया जब श्रीकृष्ण को अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ना था।  अब उन्हें वृंदावन छोड़ मथुरा की ओर रुख करना था, जहां लंबे समय से कंस के पाप और अत्याचार से धरती त्राहि त्राहि कर रही थी, कंस को मार धरती को उसके अत्याचारों और  पाप के बोझ से मुक्त करवाना था।


          श्रीकृष्ण जब वृंदावन से जाने लगे  तो समूचा वृंदावन श्रीकृष्ण के बिछोह में भाव विह्वल हो रहा था। सब नम आँखोँ से श्रीकृष्ण को विदाई देने के लिए आए हुए थे। 



          अब श्रीकृष्ण की मथुरा के लिए रवाना होने की घड़ी आ गई थी, लेकिन वह बहुत परेशान दिखाई दे रहे थे। उनकी आँखें भीड़ में राधा जी को ढूंढ रही थी। सब आए थे, बस एक राधा जी नही आई थी।


      उधर अपने घर राधा जी का कृष्ण से बिछड़ने के विषय मे सोच,  रो-रो कर बुरा हाल था। वह श्रीकृष्ण को विदा देने के लिए जाने का साहस नहीं जुटा पा रही थी।



       श्रीकृष्ण ने जब देखा कि अब राधा जी का आना मुश्किल था तो उन्होंने अपने कमर में बँधी बाँसुरी निकाल ली और राधा जी को आह्वान करते हुए अपनी बाँसुरी पर मधुर तान छेड़ दी।



     जब अपने घर पर राधा जी ने श्रीकृष्ण की मधुर तान पर उनकी  पुकार सुनी तो वह अब खुद को रोक नही पाई और कान्हा कान्हा चिल्लाते हुए बेसुध सी श्रीकृष्ण के लिए  दौड़ पड़ी।


       जब श्रीकृष्ण ने राधा को देखा तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वो दौड़ कर राधा जी के पास गए।



जब राधा ने श्रीकृष्ण से पूछा, "कन्हैया, अब तो तुम किसी और के लिए बाँसुरी बजाओगे, मुझे भूल जाओगे?"  श्रीकृष्ण ने कहा, "राधा, "मेंरी बाँसुरी सिर्फ तुम्हारे लिए बजी है, और तुम्हारे लिए हीं कभी बजी तो बजेगी अन्यथा नहीं। उसके बाद श्री कृष्ण संतुष्ट होकर अपने मार्ग चल दिये। राधा समेत सब लोग बिछोह में तड़प तड़प कर रो रहे थे। 



        समय का चक्र चलता रहा। कई वर्ष बीत गए, श्रीकृष्ण अब द्वारकाधीश बन चुके  थे। रुक्मणि जी से उनका विवाह हो चुका था। 



        उधर राधा जी का भी अपने समुदाय के किसी व्यक्ति अभिमन्यु (महाभारत का अभिमन्यु नहीं) से विवाह हो गया था। लेकिन प्रतिदिन राधा जी श्रीकृष्ण जी को भगवान मान उनको पूजती रही, यमुना किनारे प्रतिदिन जाती रही, पनघट और जिस डाली कृष्ण बैठते उन्हें घंटो निहारती रहती थी।



       समय बीतता गया। राधा जी अब बूढ़ी हो चली थी। उनके हृदय में बड़ी इच्छा थी कि अब वह बाकी का जीवन ऐसा बिताए  कि उन्हें श्रीकृष्ण के दर्शन होते रहे।


     राधा जी अपनी सोच को साकार करने के उद्देश्य से सीधे द्वारका चली गईं।उन्होंने सोचा कि किसी को भी उनके और श्रीकृष्ण जी के विषय मे पता ना चले और वो बस दूर से ही श्रीकृष्ण के दर्शन कर पाएं।  उन्होंने वहां रुक्मणि के दर्शन कर उनसे महल में नौकरानी का काम मांगा। रुक्मणि जी ने कहा कि श्रीकृष्ण जी हीं इस बात की पुष्टि करेंगे।


       शाम को जब श्रीकृष्ण जी आये और उन्होंने राधा को देखा तो  उनकी खुशी का ठिकाना नही रहा, परंतु उन्होंने अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखा ताकि कोई राधा को पहचान, गलत अर्थ न निकाल सके। उन्होंने राधा का भाव समझ, रुक्मणि जी को राधा को काम देने की हामी भर दी।



     अब प्रतिदिन अपने कार्यों को करते करते राधा जी को श्रीकृष्ण जी के दर्शन होने लगे। श्रीकृष्ण जी भी राधा जी से कुछ नही बोलते थे, बस मुस्कुरा देते थे। उनका मुस्कुराता मुख देख कर हीं राधा जी की आराधना पूर्ण हो जाती थी।



         समय बीतता गया, राधा जी को लगा कि अब शायद श्रीकृष्ण से कभी इस जीवन मे बात करने का मौका नहीं मिलेगा। यह सोच घोर उदासी में वह चुपके से एक रात राज महल से निकल पड़ी और बेतहाशा न जाने कहाँ जंगल मे दौड़ने लगी। वह रोते रोते दौड़ती जा रहीं थी। घनघोर अंधेरा, सन्नाटा था चारो ओर। तभी पीछे से एक आवाज़ आई, राधे! राधा जी चौंक गईं। उनके कदम रुक गए, काले जंगल मे एक अपूर्व सी आभा (रोशनी) फैल गई। राधा को महसूस हुआ यह तो उनके कान्हा की आवाज़ है। राधा जी ने तुरंत पीछे मुड़ कर देखा, श्रीकृष्ण बाहें फैलाये खड़े थे। एक बार पुनः धरती, गगन, प्रकृति, तीनो लोक इस पवित्र, मर्यादित, दैवीय प्रेम के गवाह बन रहे थे। धर्म भी अपने पन्नो में कुछ समेटने के लिए मानो आतुर हो रहा हो।



           श्रीकृष्ण ने राधा को गले से लगा लिया और बोले, "मुझसे छुप के, चुपके से कहाँ जा रही हो राधे। राधा बोली, "कान्हा! मेरा जीवन सफल हो गया, मेरी अंतिम घड़ी में मुझे तुम मिल गए। बस एक बार मुझे अपने पास पहले की तरह बैठाकर, वही बाँसुरी की तान सुना दो।"



         श्रीकृष्ण जी ज़मीन पर बैठ गए, राधा जी को भी ज़मीन पर सुलाकर उनका सिर अपनी गोद मे रख लिया और अपनी कमर से बाँसुरी निकाल कर बोले,  "राधा! मैंने उस दिन के बाद कभी बाँसुरी नहीं बजाई जिस दिन मैं वृंदावन में तुमसे बिछड़ा था, मैंने कहा था न मेरी बाँसुरी सिर्फ तुम्हारे लिए बजती है।"



           यह कह श्रीकृष्ण जी ने अपनी बाँसुरी पर अमर तान छेड़ दी। दिन रात बाँसुरी बजाते रहे, सुनते सुनते राधा जी श्रीकृष्ण में विलीन हो गई, और  अपना मानव शरीर छोड़ दिया।
राधा जी के इस लोक से गमन के उपरांत श्रीकृष्ण जी भी घोर उदास  और गमगीन  हो गए।



            इसके बाद श्रीकृष्ण जी ने राधा से बिछड़ने के गम से अत्यंत दुखी और पीड़ित होकर, अपनी बाँसुरी  तोड़  दी और  तोड़ कर, समुंद्र में हमेशा के लिए फैंक दी।




            यही वो समय था जब श्रीकृष्ण  जी  ने आखिरी बार अपनी बाँसुरी बजाई थी। उनकी बाँसुरी की तान पर हीं राधा जी के लिए गौ लोक के दरवाजे खुल गए और वह बैकुंठ को प्राप्त हुईं।




           उसके बाद फिर श्रीकृष्ण की बांसुरी की धुन आज तक किसी ने नही सुनी।



                ये थे भगवान श्रीकृष्ण जी जिन्होंने अपने नाम के साथ भी राधा नाम जोड़ "राधे-कृष्ण" का मंत्र बना, मुक्ति मंत्र बना दिया। जब भी श्रीकृष्ण का नाम आता है तो राधा जी के बिना श्रीकृष्ण भी अधूरे हैं।



              प्रेम करो तो ईश्वर से। ईश्वर के प्रेम में परीक्षा है, कठिनाई है, संघर्ष है लेकिन वह निश्चित है। वह उद्धारक है। वह पल पल हम पर नज़र गड़ाए हुए है। सही समय पर सच्ची पुकार सुन कर वह ज़रूर आते है, चाहे वह जीवन की आखिरी श्वास (सांस) ही क्यों न हो।



     "अध्यात्म की डगर - एक जीवन यात्रा" 


          जीवन से पहले भी, जीवन के साथ भी, जीवन के बाद भी


             पहचानिए, जानिए और मानिए

रविवार, जुलाई 05, 2020

एक भिखारी: एक देवदूत

          बहुत पुरानी बात है। एक चौराहे पर एक बूढ़ा व्यक्ति भीख मांगता था। वह प्रतिदिन प्रातःकाल हीं चौराहे पर चला जाता था और बड़े मधुर आवाज में भगवान के भजन गा - गा कर भीख मांगता था।


         उसकी आवाज़ इतनी सुरीली थी कि लगता था कि उसकी आवाज़ सीधे  भगवान के हृदय को स्पर्श करती होगी।


      लेकिन उसकी एक बड़ी विचित्र आदत थी कि भजन समाप्त होने के बाद वह हमेशा कहता था कि आज अभी बोहनी भी नहीं हुई है, इसलिए भगवान के नाम पर कुछ दो। ऐसा कहने पर लोग उसे काफी पैसे दे देते थे। थोड़ी देर बाद वह अगला भजन गांने लगता था और उसके बाद फिर कहता कि बोहनी नहीं हुई, भगवान के नाम पर कुछ दो। दिन भर इसी तरह वह कुल पांच  भजन गाता, पैसे की मांग करता था, लेकिन शाम के चार बजे के बाद उसे कहीं जाने की जल्दी होती थी, उसके बाद वह बिल्कुल नही रुकता था।


     एक व्यक्ति जो बहुत धनवान व सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित था प्रतिदिन उस चौराहे से अपने नियमित काम काज के सिलसिले में गुजरता था , उस  भिखारी की  मधुर आवाज़ में भजन सुनने के लिए उस चौराहे पर प्रतिदिन रुकता था और फिर चला जाता था।


         भिखारी की यह बात उसे बड़ी अजीब लगती थी, वह सोचता था कि इतना मधुर और भाव से भरपूर भजन गाने वाला व्यक्ति होकर, हर भजन के बाद कहता था कि अभी बोहनी नही हुई, भगवान के नाम पर कुछ दो। इसके बाद शाम को एक समय के बाद वह रुकता भी नही था चाहे कोई  कितना भी प्रलोभन क्यों न दे।


        उसे बहुत उत्सुकता हुई, एक दिन उसने सोचा कि क्यों न इसका पीछा किया जाए।


         एक दिन भिखारी जैसे ही भजन क्रिया पूरा कर, सारा पैसा इकट्ठा कर जाने लगा, वह व्यक्ति भी चुपके से उसके पीछे चल दिया।


         यह क्या? कहीं जाने के बजाए, भिखारी ने सभी  पैसों से फल, फूल, अगरबत्ती आदि खरीद प्रभु श्री राम के एक मंदिर  में गया, सारे पुष्प में से एक पुष्प स्वयं के लिए रख, सभी फलों में से एक स्वयं के लिए रख सब कुछ भगवान राम जी (सीता, लक्ष्मण व हनुमान सहित) की मूर्ति के आगे अर्पित कर दिया। उसके बाद, वह अपनी छोटी  सी झोपड़ी में गया, और फूट फूट कर रोने लगा। उसके बाद उसने वह फल खाया और फिर थोड़ा ध्यान मुद्रा में बैठ, फिर सोने की तैयारी करने लगा।


         यह देख वह व्यक्ति आश्चर्य से भर गया। उसने झोपड़ी का दरवाजा खटखटाया। भिखारी ने दरवाजा खोला और बोला मालिक आप और यहां?


           उस व्यक्ति ने बड़े आदर से कहा, " मैंने आपका पीछा किया और आपके जीवन मे एक बहुत मधुर एवं मनमोहक खुशबू महसूस की, मैं आपको थोड़ा करीब से जानना चाहता हूँ। क्या आप अपने विषय मे मेरी जिज्ञासा के लिए कुछ बताएंगे?


        भिखारी ने बड़ी विनम्रता से कहा," मालिक! मैं एक तुच्छ  इंसान हूँ। मेरे विषय मे जानने को कुछ भी विशेष नहीं।"


      लेकिन उस व्यक्ति के हाथ जोड़कर दृढ़ता से आग्रह किया और पीछा करने पर जो भी उसने देखा था, उन सभी चीजों के विषय मे पूछा तो वह(भिखारी) बोला, "मालिक! मैं भी बक्सर(बिहार में एक स्थान)  नरेश का इकलौता पुत्र हूँ। मेरे पिता की मुझसे बहुत अपेक्षाएं थी। अपनी माँ का मैं आंख का तारा था। मेरे माता पिता ने फिर मेरी शादी काशी नरेश की इकलौती पुत्री से करवा दी। शादी के कुछ वर्षों बाद मेरे घर पुत्र रत्न  की प्राप्ति हुई।


         फिर एक दिन मेरे पिता जी के राज दरबार मे एक धार्मिक सभा आयोजित की गई। सभी पड़ोसी रियासतों के राजा महाराजा उस सभा मे उपस्थित थे। वहां मैने रामायण की चर्चा के दौरान प्रभु श्री राम के जीवन महात्म्य को जाना। फिर मैंने रामायण का अध्यायवार अध्ययन किया और पाया कि प्रभु जो राजा होकर, नारायण के रूप होकर भी मानव धर्म की मर्यादा को स्थापित करने के लिए न जाने कितने दिनों वन में भूखे,प्यासे घूमते रहे। तनिक भी अपने जीवन के विषय मे नही सोचा।


        उसके बाद सांसारिक जीवन मुझे व्यर्थ लगने लगा। लगा कि मानव जीवन ईश्वर के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करने का एक सुंदर अवसर है।
उसके बाद मैंने सांसारिक जीवन सदा के लिए त्याग कर, खुद को प्रभु श्रीराम के चरणों मे समर्पित कर दिया।




         मैं प्रतिदिन ये फल उन दिनों को समर्पित करता हूँ, जिन दिनों प्रभु श्री राम वन में भूखे प्यासे भटके थे।


     उस व्यक्ति ने पूछा, इसके लिए आपको अपना राज्य, माता पिता, बीवी बच्चे छोड़ने की क्या आवश्यकता थी? यह काम तो आप अपने महल में भी रह के कर सकते थे।


    भिखारी ने उत्तर दिया, जिस राम ने स्वयं राज्य और महल का सुख त्याग वन का गमन किया है वह भला कैसे मेरे महल का फल स्वीकार कर लेते?


     फिर उस व्यक्ति ने पूछा, "इसके लिए आप भीख ही क्यों मांगते हो? मेहनत कर के भी तो फल, पुष्प आदि की व्यवस्था कर सकते हो? और बोहनी होने के बाद भी, हर भजन के बाद झूठ क्यों कहते हो कि अभी तक बोहनी नही हुई?


      भिखारी ने कहा, "मैंने अपना जीवन राम को समर्पित कर दिया है, उनके भक्ति में मैं डूबा रहता हूँ, एक राजा अपने अहम को तभी मार सकता है जब वह  भक्ति राममय होकर राजा और भिखारी के अर्थ को अपने भीतर मिटा दे। मैं राजा हूँ या भिखारी इन बातों को मैं बहुत पीछे छोड़ आया हूँ। मुझे सिर्फ इतना पता है कि दिन भर राम भजन के बाद मेरे प्रभु श्रीराम  मंदिर में मेरा इंतज़ार  करते है और मेरे द्वारा अर्पित पुष्प और फल ग्रहण करते है।  जिस तरह शरीर पांच तत्वों से निर्मित एक ढांचा है, मैं भी अपने प्रत्येक तत्व की आराधना स्वरूप  पांच भजन गाता हूँ और हर आराधना की बोहनी से पांच फल लेता हूँ जो प्रभु को अर्पित करता हूँ।


    अंत मे उस व्यक्ति ने पूछा कि क्या आपको अपने माता पिता, पत्नी और बच्चे की भावना या याद नही सताती? भिखारी ने तुरंत रोकते हुए कहा, "आप रोज कहाँ जाते हैं?" व्यक्ति बोला, "अपना व्यापार करने।" भिखारी ने पूछा, "आज क्यों नही गए? वह बोला, "आज मेरी उत्सुकता आपके विषय मे जानने की हुई और उसी में मेरा सारा समय निकल गया, उस तरफ ध्यान गया हीं नहीं।


भिखारी बोला, "मैं भी अपने राम में इतना डूब गया हूँ कि मेरे भीतर और कुछ ध्यान रहता हीं नही। सब कुछ ध्यान करके भक्ति कैसे हो सकती है?


    वह व्यक्ति भिखारी के चरणों मे गिर पड़ा। वह बोला, "धन्य हैं आप, धन्य और पावन है आपकी आत्मा।
मुझे भी अपने शरण मे ले लीजिए।


    भिखारी बोला, "मालिक! मेरी शरण मे आपको क्या मिलेगा? आप परमात्मा की शरण मे जाइये, वही आपको सुझाएंगे, बुलाएंगे और गले लगाएंगे। देखिए ना, आपसे बात करते करते आज रात निकल गई, सवेरा हो गया। मैं फिर अब चौराहे पर जाता हूँ, मेरे राम के  लिए भोजन और पुष्प जो लाने है। यह कह कर भिखारी अपनी राह को राम राम कहते चल दिया।

       वह व्यक्ति निर्झर आंखों एवं अपूर्व श्रद्धा से दूर तक उस देवदूत भिखारी को निहारता रहा।

      "अध्यात्म की डगर - एक जीवन यात्रा"-----अध्यात्म - जीवन से पहले भी, जीवन के साथ भी, जीवन के बाद भी.....

पहचानिए, जानिए और मानिए.....

आज किसे भगवान चाहिए?

        एक बार नारद जी महा-शिवरात्रि के अवसर पर धरती पर अपना भेष बदल कर पहुँचे। उन्होंने चारो तरफ घूम-घूम कर देखा, असंख्य भक्त विभिन्न मंदिर...